पटना: पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय से पहले रिहाई से जुड़े मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार के उस फैसले पर कड़ी टिप्पणी की, जिसके तहत वर्ष 2023 में जेल नियमों में संशोधन के बाद आनंद मोहन को रिहा किया गया था। हालांकि, अदालत ने इस मामले में अपना अंतिम फैसला फिलहाल सुरक्षित रख लिया है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ड्यूटी पर तैनात किसी लोकसेवक की हत्या को सामान्य अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने सवाल उठाया कि ऐसे मामलों में दोषी को राहत मिलने से समाज में गलत संदेश जा सकता है। पीठ ने यह भी कहा कि यदि ड्यूटी के दौरान सरकारी अधिकारी की हत्या के मामलों में विशेष गंभीरता नहीं दिखाई जाएगी, तो इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ सकता है।
यह मामला गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या से जुड़ा है। आनंद मोहन को इस मामले में दोषी ठहराया गया था। वर्ष 2023 में बिहार सरकार ने जेल नियमों में संशोधन किया, जिसके बाद उन्हें समय से पहले रिहा कर दिया गया। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने बिहार सरकार से इस निर्णय के औचित्य पर सवाल किए और विस्तृत पक्ष सुना। सभी दलीलें पूरी होने के बाद कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने आनंद मोहन की रिहाई रद्द करने या उन्हें दोबारा जेल भेजने का कोई आदेश नहीं दिया है। अब इस मामले में अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही सामने आएगा। अदालत के फैसले पर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों की नजर बनी हुई है।
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